लेख-सुनील गुप्ता
जब-जब ज़ुल्म ने सर उठाया, तब-तब किसी भीम ने उसे झुकाया!
14 अप्रैल 1891—दिन था, मगर कोई आम दिन नहीं था। ये वो दिन था जब विधि ने न्याय की रचना की, समाज ने क्रांति की सांस ली, और भारत की धरती पर उतरा एक ऐसा सूरज, जिसका उजाला आज भी इंसानियत की राह रोशन कर रहा है। नाम था—डॉ. भीमराव अंबेडकर।
बाबा साहब—एक नाम नहीं, एक आग है। एक जुनून है। एक क्रांति है। जिनके विचारों ने समाज की जड़ों को झकझोर दिया, और जिनकी कलम ने उन दीवारों को गिराया जो सदियों से ऊंच-नीच के नाम पर खड़ी थीं।
जो खुद बचपन में गालियाँ खाकर बड़े हुए, वो देश को बराबरी का पाठ पढ़ा गए। जिनके हिस्से में समाज का तिरस्कार आया, वही समाज के संविधान का निर्माता बना!
बाबा साहब ने सिर्फ संविधान नहीं लिखा, उन्होंने दलित, पिछड़े, महिलाओं, मजदूरों—हर उस इंसान को आवाज़ दी जिसे कभी खामोश रहना सिखाया गया था।
उनकी बातों में बिजली थी—
> “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो!”
ये कोई स्लोगन नहीं था, ये क्रांति का बिगुल था!
आज जब लोग अपने हक के लिए लड़ते हैं, जब संविधान की बात करते हैं, जब बराबरी की उम्मीद करते हैं—तो वो सब बाबा साहब की ही देन है।
और सुन लो दुनिया वालों—भीम रुका नहीं है, भीम थका नहीं है, भीम झुका नहीं है, और भीम मिटा नहीं है।
वो हर उस दिल में धड़कता है जो इंसानियत में यकीन रखता है।
इस 14 अप्रैल को सिर्फ मोमबत्ती जलाओ मत, अंदर के अंधेरे को भी जलाओ।
केक काटो मत, भेदभाव की जड़ काटो।
फूल चढ़ाओ मत, उनके विचारों को अपनाओ।
क्योंकि बाबा साहब को याद करना नहीं, जीना है।
जय भीम!





